।। जैन धर्म में डिजिटल क्रान्ति का शंखनाद ।।

।। समग्र जैन धर्म की विश्व की प्रथम चातुर्मास-विहार वेब साईट ।।

समग्र जैन परम्परा में धार्मिक-सामाजिक समन्वय की दिशा में एक विनम्र प्रयास

 वह घर-परिवार धन्य है !
वह ग्राम-नगर धन्य है!
 वह देश-प्रदेश भी धन्य है !
 जहा पंच महाव्रतधारी गुरू भगवंतों के चरण पड़ते है !
जहां उनके चातुर्मास होते है।

    श्रावण-भाद्रपद-आश्विन-कार्तिक, यह चार महीने *चातुर्मास* या *वर्षावास* के नाम से प्रसिद्ध है। इस काल में प्रायः निरन्तर वर्षा होती रहती है। इससे नदी-नाले उमड़ जाते हैं। वनस्पतिकाय आदि सूक्ष्म-स्थूल जीव-जन्तु उत्पन्न हो जाते हैं। अतः किसी भी *परजीव की विराधना* तथा *आत्मविराधना* से बचने के लिए तीर्थंकर परमात्मा ने श्रमण-श्रमणी को वर्षाकाल के इन 4 माह में विहार का त्याग करके एक स्थान पर ही रहने का विधान किया गया है। उल्लेखनीय है कि *चातुर्मास आध्यात्मिक जागृति का महापर्व है,* जिसमें स्व-परहित साधन का अच्छा अवसर प्राप्त होता है। जिस प्रकार जल की शीतल धारा धरती की तपन शांत करती है, उसी प्रकार वर्षावास के समय जैन साधु-साध्वी (मुनिराज-आर्यिका, संत-सतियांजी, श्रमण-श्रमणी ) *कषाय रूपी अग्नि को एवं मिथ्यात्व रूपी ताप* को त्याग एवं वैराग्य की शीतल धारा से तथा स्वाध्याय और ध्यान की जलवृष्टि से शांत करते है। *न केवल श्रमण-श्रमणी के लिए अपितु श्रावक-श्राविका के लिए भी इस चातुर्मास काल का धार्मिक तथा आध्यात्मिक विकास की दृष्टि से अत्यधिक महत्व है।*

प्राचीन काल में श्रावक-श्राविका भी चार माह *देशान्तर भ्रमण का त्याग* करके अपने नगर में ही रहकर साधना-आराधना, तप-त्याग करते थे। आज भी कुछ ऐसे श्रावक है, जो चातुर्मास के दौरान अपने नगर से बाहर भ्रमण नही करते हैं। कालान्तर में अनेक श्रावक अपने नगरों में श्रमण भगवंतों के चातुर्मास नही होने पर *ज्ञान प्राप्ति के लिए, देव-गुरू के दर्शन के लिए, वैयावच्च के लिए एवं चारित्र आदि के लिए* इस चातुर्मास की अवधि में भ्रमण करने लगे है।

वर्तमान युग *सोश्यल मीडिया* का युग है। संचार के इस युग में प्रत्येक जैन श्रावक यह चाहता है, कि उसे अपने गुरू भगवंतों के *चातुर्मास* की सूचना चातुर्मास प्रारम्भ होते ही मिल जाये तथा शेष काल में *विहाररत* समस्त गुरूभगवंतों के विहार की *अपडेट* मिलती रहे। इसी आवश्यकता का महसूस करते हुए श्री सौधर्मबृहत्पागच्छीय त्रिस्तुतिक परंपरा के गच्छाधिपति आ.श्री नित्यसेनसूरिजी म.सा. की प्रेरणा से एवं परम पूज्य मुनिराज श्री विद्वतरत्नविजयजी म. सा. मार्गदर्शक में *जैन इन्टरनेशनल ट्रस्ट एवं आर्गनाइजेशन डाटा सेन्टर* द्वारा www.jainchaturmas.in वेबसाईट लांच की गई है। इसे हम *जैन धर्म में डिजिटल क्रान्ति का शंखनाद* कह सकते है। समग्र जैन श्री संघ के धार्मिक-सामाजिक समन्वय की दिशा में यह एक *विनम्र प्रयास* भी है। इसमें समग्र जैन परम्परा के 60 समुदाय की चातुर्मास सूची दी गई है, जिन्हें यथावत रूप से प्रसारित कर दिया गया है। पुनः निवेदन यदि कि आपके ग्राम-नगर में साधु-साध्वी भगवंत के चातुर्मास हो तब अपने नगर में ही रहकर तप-त्याग पूर्वक साधना-आराधना करते हुए विराधना से बचें। जिनाज्ञा के विपरित कुछ कहा हो तो, वह मेरा दुष्कृत्य मिथ्या हो ,मिथ्या हो, मिथ्या हो !

*विशेष निवेदन-* समग्र जैन परम्परा के इस डिजीटल मंच रूपी वेबसाईट के सतत् संचालन हेतु निवेदन है, कि आपके पास जब भी जिस किसी भी पंथ-समुदाय की चातुर्मास सूची प्राप्त हो, वह हमें प्रतिवर्ष प्रेषित करते रहें। इसी प्रकार चातुर्मास के पश्चात किसी भी गुरूभगवंत के विहार की सूचना नियमानुसार हमें पहुंचाते रहें। इस वेबसाईट पर आजीवन संरक्षक, शुभेच्छुक के रूप में भी आपका स्वेच्छिक सहयोग सादर अपेक्षित है।

Director
*Kritik Kumar Jain*
Jain International Trust & Org. Data Centre
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